Sunday, 28 April 2019

गीतिका

























































































































































































इस धराधाम पर जन्म लेने के पहले जीव माँ के गर्भ में परमपिता परमात्मा सा ध्यान एवं दर्शन किया करता है और उनके द्वारा प्राप्त सदुपदेश को स्वयं में धारण करके अपनी मुट्ठी में बन्द कर लेता है | गर्भ में ही जीव परमात्मा को वचन देता है कि वह जीवन भर सत्कार्य करते हुए लोककल्याणक कार्यों के द्वारा उस परमपिता का सानिध्य प्राप्त करने का प्रयास करता रहेगा | यही मूलधन अपनी बंद मुट्ठी में लेकर जीव इस धरती पर आता है | परंतु यहाँ आकर उसकी मुट्ठी खुल जाती है और वह अपने सारे वचन व सकारात्मकता को भूल जाता है | जबकि मनुष्य को अपने सद्विचारों , सत्कार्यों का त्याग कभी नहीं करना चाहिए | जिस प्रकार एक व्यापारी थोड़ी सी पूंजी लेकर व्यापार प्रारम्भ करके एक बड़ा सेठ बनता है उसी प्रकार मनुष्य अपने थोड़े से ज्ञान का विस्तार करके विद्वान बन सकता है | परंतु व्यापारी की सफलता का राज होता है उसकी वह सोंच जो कि उसे प्रतिपल अपने उस मूलधन को बचाये रखने की ओर प्रेरित करता रहता है जिस मूलधन को लेकर उसने अपना व्यापार प्रारम्भ किया था | किसी भी व्यापार में फायदा हो या न हो परन्तु मूलधन (पूंजी) का ह्रास कभी नहीं करने वाला ही सफल व्यापारी बनता है | उसी प्रकार हमारे महापुरुषों ने अपने जीवन में अपने मूलधन (ब्रह्मचर्य , ज्ञान , आत्मबल एवं विद्या) को बचाये रखते हुए उसमें और वृद्धि करके ही संसार को नित्य नये ज्ञानदर्शन कराते रहे हैं | जिसने भी अपने मूल का ध्यान नहीं रखा वह अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता |












आज आधुनिकता के युग में मनुष्य नित नये अनुसंधान कर रहा है और नयी नयी तकनीक विकसित कर रहा है तो इसके मूल में है उसका ज्ञान | आज संसार भर में यदि हाहाकार , अनाचार , अत्याचार एवं आतंकवाद अपने चरम पर है तो उसका मुख्य कारण यही माना जा सकता है कि संसार में उपस्थित अनेक धर्मों की आड़ लेकर ऐसा कृत्य करने वाले लोग अपने मूलधर्म "मानवता" को भूल गये हैं और जो अपने मूल को भुला देता है उसका अन्त सुखद हो ही नहीं सकता , वह एक दिन उसी व्यापारी की तरह ही पछताता है जिसने अपने फायदे के साथ जमापूँजी भी व्यय कर दी हो | मैं गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित दिव्य श्रीरामचरितमानस के माध्यम से बताना चाहता हूँ कि यद्यपि अयोध्या में साक्षात रिद्धियां - सिद्धियां निवास करती थीं परन्तु जब श्रीराम को केवट के पास गंगातट पर छोड़कर मंत्री सुमंत्र लौटे तो उन्हें लगा कि आज अयोध्या ने अपनी मूल पूँजी (श्रीराम) को गँवा दिया | सुमंत्र की स्थिति का वर्णन करते हुए बाबाजी ने भाव दिया :- "फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई" अर्थात जैसे कोई बनिया अपनी मूलपूँजी को भी लुटाकर लौट रहा हो | कहने का तात्पर्य यह है कि जिसके जीवन से परमात्मा दूर हो गया समझ लो उसने अपना मूल गँवा दिया , और जिसने अपना मूल गँवा दिया उसका कल्याण कैसे सम्भव है ? अत: प्रत्येक मनुष्य को अपना मूलधन बचाकर ही रखना चाहिए |












































































































































































मैं तुम्हारे मुँह पर तुम्हारी जितनी भी शिकायत कर लूँ लेकिन तुमने जो मेरे और मेरे परिवार के लिए त्याग किए हैं और इतने वर्षों में जो असीमित प्रेम दिया है उसके सामने मैं इस डायरी में लिख सकूँ ऐसी कोई कमी मुझे तुममें दिखाई ही नहीं दी। ऐसा नहीं है कि तुममें कोई कमी नहीं है लेकिन तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा समर्पण, तुम्हारा त्याग उन सब कमियों से ऊपर है। मेरी अनगिनत अक्षम्य भूलों के बाद भी तुमने जीवन के प्रत्येक चरण में छाया बनकर मेरा साथ निभाया है। अब अपनी ही छाया में कोई दोष कैसे दिखाई दे मुझे। 
























दोस्तो, ये एक काल्पनिक कहानी हो सकती है। पति की जगह पत्नी भी हो सकती है और पत्नी की जगह पति भी। सीखना केवल ये है कि जब जवानी का सूर्य अस्ताचल की ओर प्रयाण शुरू कर दे तब हम एक-दूसरे की कमियां या गल्तियां ढूँढने की बजाए अगर ये याद करें हमारे साथी ने हमारे लिए कितना त्याग किया है, उसने हमें कितना प्रेम दिया है, कैसे पग-पग पर हमारा साथ दिया है तो निश्चित ही जीवन में प्रेम फिर से पल्लवित हो जाएगा। 
















































































































































































































































































































































































































































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