Sunday, 28 April 2019

गीतिका

गीतिका

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धरा बेच देगे गगन बेच देगेहमारे ये दुश्मन कफ़न बेच देगे

तिरंगे से लिपटा किसी का है भाई
ये बहनों के सारे बदन बेच देगे

माँ भारती के बड़े लाडले है
ये माँओ के सारे सपन बेच देगे

सजता सँवरता ये देश अपना
गुलशन व सारे चमन बेच देगे

चीत्कार करती माँ बेटियाँ कितनी
वर्दी के संग ये अमन बेच देगे

हमें मिलके करना है आज कुछ तो
नही तो ये अपना चलन बेच देगे

होगी सूकूनो की क्या अपनी रातें
लगता है ऐसा कथन बेच देगे

खड़ी है ""दर पे तेरे हे दाता
नही तो ये अपना रुदन बेच देगे


तुमने कहा था आँख भर करदेख लिया करो मुझे,
पर अब #आँख #भर आती है और #तुम #नज़र नहीं आते हो.

🔴 आज का प्रात: संदेश 🔴
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इस धराधाम पर जन्म लेने के पहले जीव माँ के गर्भ में परमपिता परमात्मा सा ध्यान एवं दर्शन किया करता है और उनके द्वारा प्राप्त सदुपदेश को स्वयं में धारण करके अपनी मुट्ठी में बन्द कर लेता है | गर्भ में ही जीव परमात्मा को वचन देता है कि वह जीवन भर सत्कार्य करते हुए लोककल्याणक कार्यों के द्वारा उस परमपिता का सानिध्य प्राप्त करने का प्रयास करता रहेगा | यही मूलधन अपनी बंद मुट्ठी में लेकर जीव इस धरती पर आता है | परंतु यहाँ आकर उसकी मुट्ठी खुल जाती है और वह अपने सारे वचन व सकारात्मकता को भूल जाता है | जबकि मनुष्य को अपने सद्विचारों , सत्कार्यों का त्याग कभी नहीं करना चाहिए | जिस प्रकार एक व्यापारी थोड़ी सी पूंजी लेकर व्यापार प्रारम्भ करके एक बड़ा सेठ बनता है उसी प्रकार मनुष्य अपने थोड़े से ज्ञान का विस्तार करके विद्वान बन सकता है | परंतु व्यापारी की सफलता का राज होता है उसकी वह सोंच जो कि उसे प्रतिपल अपने उस मूलधन को बचाये रखने की ओर प्रेरित करता रहता है जिस मूलधन को लेकर उसने अपना व्यापार प्रारम्भ किया था | किसी भी व्यापार में फायदा हो या न हो परन्तु मूलधन (पूंजी) का ह्रास कभी नहीं करने वाला ही सफल व्यापारी बनता है | उसी प्रकार हमारे महापुरुषों ने अपने जीवन में अपने मूलधन (ब्रह्मचर्य , ज्ञान , आत्मबल एवं विद्या) को बचाये रखते हुए उसमें और वृद्धि करके ही संसार को नित्य नये ज्ञानदर्शन कराते रहे हैं | जिसने भी अपने मूल का ध्यान नहीं रखा वह अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता |

आज आधुनिकता के युग में मनुष्य नित नये अनुसंधान कर रहा है और नयी नयी तकनीक विकसित कर रहा है तो इसके मूल में है उसका ज्ञान | आज संसार भर में यदि हाहाकार , अनाचार , अत्याचार एवं आतंकवाद अपने चरम पर है तो उसका मुख्य कारण यही माना जा सकता है कि संसार में उपस्थित अनेक धर्मों की आड़ लेकर ऐसा कृत्य करने वाले लोग अपने मूलधर्म "मानवता" को भूल गये हैं और जो अपने मूल को भुला देता है उसका अन्त सुखद हो ही नहीं सकता , वह एक दिन उसी व्यापारी की तरह ही पछताता है जिसने अपने फायदे के साथ जमापूँजी भी व्यय कर दी हो | मैं गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित दिव्य श्रीरामचरितमानस के माध्यम से बताना चाहता हूँ कि यद्यपि अयोध्या में साक्षात रिद्धियां - सिद्धियां निवास करती थीं परन्तु जब श्रीराम को केवट के पास गंगातट पर छोड़कर मंत्री सुमंत्र लौटे तो उन्हें लगा कि आज अयोध्या ने अपनी मूल पूँजी (श्रीराम) को गँवा दिया | सुमंत्र की स्थिति का वर्णन करते हुए बाबाजी ने भाव दिया :- "फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई" अर्थात जैसे कोई बनिया अपनी मूलपूँजी को भी लुटाकर लौट रहा हो | कहने का तात्पर्य यह है कि जिसके जीवन से परमात्मा दूर हो गया समझ लो उसने अपना मूल गँवा दिया , और जिसने अपना मूल गँवा दिया उसका कल्याण कैसे सम्भव है ? अत: प्रत्येक मनुष्य को अपना मूलधन बचाकर ही रखना चाहिए |
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प्रत्येक मनुष्य को अपने मूल का संरक्षण करते हुए उसमें उत्तरोत्तर वृद्धि करते रहना चाहिए अन्यथा वह अपने जीवन में कभी भी सफल नहीं हो सकता |
बस थोड़ा सा सोचने की देर है……

शादी की बीसवीं वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर पति-पत्नी साथ में बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। संसार की दृष्टि में वो एक आदर्श युगल था। प्रेम भी बहुत था दोनों में लेकिन कुछ समय से ऐसा प्रतीत हो रहा था कि संबंधों पर समय की धूल जम रही है। शिकायतें धीरे-धीरे बढ़ रही थीं। 

बातें करते-करते अचानक पत्नी ने एक प्रस्ताव रखा कि मुझे तुमसे बहुत कुछ कहना होता है लेकिन हमारे पास समय ही नहीं होता एक-दूसरे के लिए। इसलिए मैं दो डायरियाँ ले आती हूँ और हमारी जो भी शिकायत हो हम पूरा साल अपनी-अपनी डायरी में लिखेंगे। 

अगले साल इसी दिन हम एक-दूसरे की डायरी पढ़ेंगे ताकि हमें पता चल सके कि हममें कौन सी कमियां हैं जिससे कि उसका पुनरावर्तन ना हो सके। पति भी सहमत हो गया कि विचार तो अच्छा है। डायरियाँ आ गईं और देखते ही देखते साल बीत गया। 

अगले साल फिर विवाह की वर्षगांठ की पूर्वसंध्या पर दोनों साथ बैठे। एक-दूसरे की डायरियाँ लीं। पहले आप, पहले आप की मनुहार हुई। आखिर में महिला प्रथम की परिपाटी के आधार पर पत्नी की लिखी डायरी पति ने पढ़नी शुरू की।

पहला पन्ना...... दूसरा पन्ना........ तीसरा पन्ना

..... आज शादी की वर्षगांठ पर मुझे ढंग का तोहफा नहीं दिया।
.......आज होटल में खाना खिलाने का वादा करके भी नहीं ले गए।
.......आज मेरे फेवरेट हीरो की पिक्चर दिखाने के लिए कहा तो जवाब मिला बहुत थक गया हूँ
........ आज मेरे मायके वाले आए तो उनसे ढंग से बात नहीं की
.......... आज बरसों बाद मेरे लिए साड़ी लाए भी तो पुराने डिजाइन की

ऐसी अनेक रोज़ की छोटी-छोटी फरियादें लिखी हुई थीं। पढ़कर पति की आँखों में आँसू आ गए। पूरा पढ़कर पति ने कहा कि मुझे पता ही नहीं था मेरी गल्तियों का। मैं ध्यान रखूँगा कि आगे से इनकी पुनरावृत्ति ना हो।

अब पत्नी ने पति की डायरी खोली
पहला पन्ना.......कोरा
दूसरा पन्ना.........कोरा
तीसरा पन्ना...........कोरा
अब दो-चार पन्ने साथ में पलटे वो भी कोरे फिर 50-100 पन्ने साथ में पलटे तो वो भी कोरे

पत्नी ने कहा कि मुझे पता था कि तुम मेरी इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकोगे। मैंने पूरा साल इतनी मेहनत से तुम्हारी सारी कमियां लिखीं ताकि तुम उन्हें सुधार सको। और तुमसे इतना भी नहीं हुआ। पति मुस्कुराया और कहा मैंने सब कुछ अंतिम पृष्ठ पर लिख दिया है। पत्नी ने उत्सुकता से अंतिम पृष्ठ खोला। उसमें लिखा था

मैं तुम्हारे मुँह पर तुम्हारी जितनी भी शिकायत कर लूँ लेकिन तुमने जो मेरे और मेरे परिवार के लिए त्याग किए हैं और इतने वर्षों में जो असीमित प्रेम दिया है उसके सामने मैं इस डायरी में लिख सकूँ ऐसी कोई कमी मुझे तुममें दिखाई ही नहीं दी। ऐसा नहीं है कि तुममें कोई कमी नहीं है लेकिन तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा समर्पण, तुम्हारा त्याग उन सब कमियों से ऊपर है। मेरी अनगिनत अक्षम्य भूलों के बाद भी तुमने जीवन के प्रत्येक चरण में छाया बनकर मेरा साथ निभाया है। अब अपनी ही छाया में कोई दोष कैसे दिखाई दे मुझे।

अब रोने की बारी पत्नी की थी। उसने पति के हाथ से अपनी डायरी लेकर दोनों डायरियाँ अग्नि में स्वाहा कर दीं और साथ में सारे गिले-शिकवे भी। फिर से उनका जीवन एक नवपरिणीत युगल की भाँति प्रेम से महक उठा।

दोस्तो, ये एक काल्पनिक कहानी हो सकती है। पति की जगह पत्नी भी हो सकती है और पत्नी की जगह पति भी। सीखना केवल ये है कि जब जवानी का सूर्य अस्ताचल की ओर प्रयाण शुरू कर दे तब हम एक-दूसरे की कमियां या गल्तियां ढूँढने की बजाए अगर ये याद करें हमारे साथी ने हमारे लिए कितना त्याग किया है, उसने हमें कितना प्रेम दिया है, कैसे पग-पग पर हमारा साथ दिया है तो निश्चित ही जीवन में प्रेम फिर से पल्लवित हो जाएगा।


बस थोड़ा सा सोचने की देर है ………
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मेरे ख़ामोश होंठों को हँसाने कौन आया है
मेरी वीरान दुनिया को सजाने कौन आया है
अभी तक जो मिला इक दर्द ही देकर गया मुझको
मेरे ज़ख़्मों पे अब मरहम लगाने कौन आया है!!
https://94143.blogspot.com/
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गज़ल,

बेनाम सा यह दर्द ठहर क्यों नही जाता;
जो बीत गया है वो गुज़र क्यों नही जाता;

सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें;
क्या बात है मैं वक्त पे घर क्यूं नही जाता;

वो एक ही चेहरा तो नही सारे जहाँ मैं;
जो दूर है वो दिल से उतर क्यों नही जाता;

मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा;
जाते है जिधर सब मैं उधर क्यूं नही जाता;

वो नाम जो बरसों से न चेहरा है न बदन है;
वो ख्वाब अगर है तो बिखर क्यूं नही जाता;

जो बीत गया है वो गुज़र क्यूं नही जाता;
बेनाम सा यह दर्द ठहर क्यों नही जाता।
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ये मेरी जिंदगी है ना
ये दस्तक देके कहती है
बिना साहिल के बहती हो
अकेली कैसे सहती हो
कोई आया है या ....
कोई उतर के जा रहा है


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मेरे ख़ामोश होंठों को हँसाने कौन आया है
मेरी वीरान दुनिया को सजाने कौन आया है
अभी तक जो मिला इक दर्द ही देकर गया मुझको
मेरे ज़ख़्मों पे अब मरहम लगाने कौन आया है!!
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कंधे पर सिर रख रोलूँ क्या.. तुम आँखों से सब पढ़ लो न मै मुँह से आखिर बोलूँ क्या.. ये इश्क़,मोहब्बत,प्यार,वफ़ा तुम छोड़ चले मैं ढोलूँ क्या.. कुछ दूर अभी अँधियारा है मैं साथ तुम्हारे हो लूँ क्या.. कई रंग उभर के आयेंगे आँखों में सपने घोलू क्या..
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दिल के आईने मे किसे ढूंढ रहे है...?
जो पास है क्यों उसे भूल रहे है...?

हमारे जो नहीं है उसे पाने मै हम लग गए ...
जो पास है हमारी उन्हें हम युही छोड़ दिए...

मन्न के इस कश्मकश को कैसे हम सहे...?
दिल के इस सवाल को किस्से हम कहे..

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सारी खिड़कियाँ और दरवाजे बन्द कर लेता हुँ..
फिर भी ना जाने कहाँ से आ जाती है तूम्हारी यादें..
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सुबह की हलकी धूप कुछ याद दिलाती है, 
हर महकती खुशबू एक जादू जगाती है, 
कितनी भी व्यस्त क्यों ना हो यह ज़िन्दगी, 
सुबह सुबह अपनों की याद आ ही जाती है। 
सुप्रभात दोस्तों 
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कल न हम होंगे न कोई गिला होगा !
सिर्फ सिमटी हुई यादों का सिलसिला होगा !!

जो लम्हे हैं चलो हँस कर बिता ले...!
जाने कल जिंदगी का क्या फैसला होगा !!
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सुप्रभात मित्रों 
एक शर्मनाक कड़वी सच्चाई..

नदी तालाब में नहाने में शर्म आती है,
और
स्विमिंग पूल में तैरने को फैशन कहते हैं,
.
गरीब को एक रुपया दान नहीं कर सकते,
और
वेटर को टिप देने में गर्व महसूस करते हैं.
.
माँ बाप को एक गिलास पानी भी नहीं दे सकते,
और
नेताओं को देखते ही वेटर बन जाते हैं.
.
बड़ों के आगे सिर ढकने में प्रॉब्लम है,
लेकिन
धूल से बचने के लिए 'ममी' बनने को भी तैयार हैं.
.
पंगत में बैठकर खाना दकियानूसी लगता है,
और
पार्टियों में खाने के लिए लाइन लगाना अच्छा लगता है.
.
बहन कुछ माँगे तो फिजूल खर्च लगता है,
और
गर्लफ्रेन्ड की डिमांड को अपना सौभाग्य समझते हैं.
.
गरीब की सब्ज़ियाँ खरीदने मे इन्सल्ट होती है,
और
शॉपिंग मॉल में अपनी जेब कटवाना गर्व की बात है.
.
बाप के मरने पर सिर मुंडवाने में हिचकते हैं.
और
'गजनी' लुक के लिए हर महीने गंजे हो सकते हैं.
.
कोई पंडित अगर चोटी रखे तो उसे एन्टीना कहते हैं.
और
शाहरुख के 'डॉन' लुक के दीवाने बने फिरते हैं.
.
किसानों के द्वारा उगाया अनाज खाने लायक नहीं लगता,
और
उसी अनाज को पॉलिश कर के कम्पनियाँ बेचें,
तो
क्वालिटी नजर आने लगती है...॥


ये सब मात्र
अपसंस्कृति ही नही,
वरन्
देश व समाज का
दुर्भाग्य भी है ।
.


अगर सहमत हों
तो आगे प्रेषित करें..॥
Post this on your family groups

Happy world family day

"परिवार" से बड़ा कोई
"धन" नहीं!
"पिता" से बड़ा कोई 
"सलाहकार" नहीं!
"माँ" की छाव से बड़ी
कोई "दुनिया" नहीं!
"भाई" से अच्छा कोई 
"भागीदार" नहीं!
"बहन" से बड़ा कोई
"शुभचिंतक" नहीं!
"पत्नी" से बड़ा कोई
"दोस्त" नहीं
इसलिए
"परिवार" के बिना
"जीवन" नहीं!!!
👏👏👏👏👏


•"परिवार में"- कायदा नही परन्तु व्यवस्था होती है।
•"परिवार में"- सूचना नहीं परन्तु समझ होती है।
•"परिवार में"- कानून नहीं परन्तु अनुशासन होता है।
•"परिवार मे"- भय नहीं परन्तु भरोसा होता है।
• "परिवार मे"- शोषण नहीं परन्तु पोषण होता है।
•"परिवार मे"- आग्रह नही परन्तु आदर होता है।
•"परिवार मे"- सम्पर्क नही परन्तु सम्बन्ध होता है ।
•"परिवार मे"- अर्पण नही परन्तु समर्पण होता है।

खुदा से झोली फैला के मांगा था उसे,
खुदा ने मेरी किसी दुआ को सुना ही नही,
मैन तो बहुत चाहा था उसे मगर,
लाख कोशिशों से भी वो मिला ही नही,
हर एक से पूछा सबब उस के ना मिलने का,
हर एक ने कहा वह तेरे लिए बना ही नही…

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दिल तोड़ना शायद उनकी आदत सी हो गयी है;
वरना वो तो फूल भी नहीं तोड़ते थे;
आज हमसे दूर-दूर से रहते हैं वो;
एक वक़्त था जब साथ नहीं छोड़ते थे वो!
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पसंद और प्रेम में दोनों में क्या #अंतर है ?

इसका सबसे सुन्दर जवाब गौतम बुद्ध ने दिया है :-
अगर तुम 1 फूल को पसन्द करते हो तो तुम उसे तोड़कर रखना चाहोगे।

लेकिन अगर उस फूल से प्रेम करते हो तो तोड़ने के बजाय तुम रोज उसमें पानी डालोगे ताकि फूल मुरझाने न पाए।

जिसने भी इस रहस्य को समझ लिया समझो उसने पूरी #जिंदगी को ही समझ लिया**
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किसी के दिल में बसना कुछ बुरा तो नही...
किसी को दिल में बसाना कोई खता तो नही....
गुनाह हो यह ज़माने की नजर में तो क्या....
यह ज़माने वाले कोई खुदा तो नही....
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दिल की हर बात ज़माने को बता देते है
अपने हर राज़ से परदा उठा देते है
चाहने वाले हमे चाहे या ना चाहे
हम जिसे चाहते है उस पर ‘जान’ लूटा देते है.
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इस मोहब्बत की किताब के,
बस दो ही सबक याद हुए,
कुछ तुम जैसे आबाद हुए,
कुछ हम जैसे बरबाद हुए।


आपके बाद जो पल गुज़रा वो बस गुज़रा है. . पल जो थे आपके साथ वो पल ही बस ज़िया है 

"जिंदगी कितने मोड़ लेती है...
हर मोड़ पर एक सवाल देती है....

ढूंढते रेह्ते है जवाब हम उम्रभर...
जब जवाब मिलता है तो जिंदगी सवाल बदल देती है "...!!!
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मेरे ख़ामोश होंठों को हँसाने कौन आया है
मेरी वीरान दुनिया को सजाने कौन आया है
अभी तक जो मिला इक दर्द ही देकर गया मुझको
मेरे ज़ख़्मों पे अब मरहम लगाने कौन आया है!!

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अदा लबों से दिल की बात हो जाने दो,

अदा लबों से दिल की बात हो जाने दो,
कबूल आज दिल की इबादत हो जाने दो,
तनहा चल रहे हो दश्त ए जीस्त में
दो पल मुझको जरा साथ हो जाने दो !