पहलू बस एक देख के करिए ना फ़ैसला

कुछ ख़ामियाँ अगर हैं तो कुछ ख़ूबियाँ भी हैं......

सच क़ो लफ़्ज़ों की दरकरार नही होती .....
तुमने सर हिला दिया,
मुझे यकीन हो गया..

आप मगरूर क्यों समझते है ............
मुझे कम बोलने की आदत है....." साहब"

.टूटी हुई हसरतें ब्यां किया करती हैँ किस्से अक्सर...
...दिल की राह से गुज़रे हैँ...अज़ाब कई....

ये बात और है कि इज़हार ना कर सकेँ......
नहीँ है तुम से मोहब्बत................भला

अगर व्यक्ति में उन्हें स्वीकार करने के साहस है तो गलतियाँ हमेशा क्षम्य हैं...
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